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Sunday, September 20, 2020
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संसार के ऐश्वर्य की स्वामिनी माता भुवनेश्वरी:- बाबा-भागलपुर 

भागलपुर, बिहार। आदिशक्ति भगवती भुवनेश्वरी भगवान शिव के समस्त लीला-विलास की सहचरी है। माता भुवनेश्वरी सम्पूर्ण संसार के ऐश्वर्य की स्वामिनी है।
इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि:- जगदम्बा भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंग कांति अरुण है। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करना इन का स्वाभाविक गुण है। दस महाविद्याओं में यह चतुर्थ स्थान पर परिगणित हैं। देवी पुराण के अनुसार मूल प्रकृति का दूसरा नाम ही भुवनेश्वरी है।
ईश्वर रात्रि में जब ईश्वर के जगद्रूप व्यवहार का लोप हो जाता है, उस समय केवल ब्रह्मा अपनी अव्यक्त प्रकृति के साथ शेष रहता है, तब ईश्वर रात्रि की अधिष्ठात्री देवी भुवनेश्वरी कहलाती है। इनका “ह्रीं” बीज मंत्र है। इसे माया बीज कहते हैं। इस मंत्र के निरन्तर जाप से शक्ति, सुरक्षा, पराक्रम, लक्ष्मी व देवी कृपा की प्राप्ति होती है। अंकुश और पाश इनके मुख्य आयुध हैं। अंकुश नियंत्रण का प्रतीक है और पाश राग अथवा आसक्ति का प्रतीक है। इस प्रकार सर्वरूपा मूल प्रकृति ही भुवनेश्वरी हैं, जो विश्व को वमन करने के कारण वामा, शिवमय होने से ज्येष्ठा तथा कर्म नियंत्रण, फलदार और जीवों को दंडित करने के कारण रौद्री कही जाती है। भगवान शिव का वाम भाग ही भुवनेश्वरी कहलाता है। भुवनेश्वरी के संग से ही भुवनेश्वर सदाशिव को सर्वेश होने की योग्यता प्राप्त होती है। 
महानिर्वाणतंत्र के अनुसार संपूर्ण महाविद्याएँ भगवती भुवनेश्वरी की सेवा में सदा संलग्न रहती हैं। सात करोड़ महामंत्र इनकी सदा आराधना करते हैं। दस महाविद्याएँ ही दस सोपान हैं। काली तत्व से निर्गत होकर कमला तत्व तक की दस स्थितियाँ हैं, जिनसे अव्यक्त भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्मांड का रूप धारण कर सकती है तथा प्रलय में कमला से अर्थात व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर काली रूप में मूल प्रकृति बन जाती हैं। इसलिए इन्हें काल की जन्म दात्री भी कहा जाता है।
श्रीदुर्गासप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के मंगलाचरण में भी कहा गया है कि ‘मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूँ। उनके श्रीअंगों की शोभा प्रातः काल के सूर्य देव के समान अरुणाभ है। उनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट है। तीन नेत्रों से युक्त देवी के मुख पर मुस्कान की घटा छाई रहती है। उनके हाथों में पाश, अंकुश, वरद एवं अभय मुद्रा शोभा पाते हैं। इस प्रकार बृहदन्नलतन्त्र की धारणा पुराणों के विवरणों से भी पुष्ट होती है कि प्रकारान्तर से काली और भुवनेश्वरी दोनों में अभेद है। अव्यक्त प्रकृति भुवनेश्वरी ही रक्त वर्णा काली हैं।
देवी भागवत के अनुसार दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचार से संतप्त होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर सर्व कारण स्वरूपा भगवती भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवती भुवनेश्वरी तत्काल प्रकट हो गई। वह अपने हाथों में वाण, कमल पुष्प तथा शाक-मूल लिए हुए थी। उन्होंने अपने नेत्रों से अश्रु जल की सहस्त्रो धाराएँ प्रकट की। इस जल से भूमंडल के सभी प्राणी तृप्त हो गए। समुद्रों तथा सरिताओं में अगाध जल भर गया और समस्त औषधियाँ सिंच गई। अपने हाथ में लिए गए शाकों और फल मूल से प्राणियों का पोषण करने के कारण भगवती भुवनेश्वरी ही “शताक्ष”‘ तथा “शाकंभरी” नाम से विख्यात हुई तथा दुर्गामासुर को युद्ध में मार कर उनके द्वारा अपहृत वेदों को देवताओं को पुनः सौंपा था। उसके बाद भगवती भुवनेश्वरी का एक नाम दुर्गा प्रसिद्ध हुआ। भगवती भुवनेश्वरी की उपासना ऐश्वर्य व पुत्र प्राप्ति के लिए विशेष फलप्रदा है।

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