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मंत्र एक अनोखा और उत्तम साधन:- बाबा-भागलपुर, अध्यात्मिक सम्पादक, जानकारी जंक्शन

मंत्र एक अनोखा और उत्तम साधन:- बाबा-भागलपुर, अध्यात्मिक सम्पादक, जानकारी जंक्शन

मंत्र शब्द का अर्थ असीमित है। वैदिक ऋचाओं के प्रत्येक छन्द भी मंत्र कहे जाते हैं तथा देवी-देवताओं की स्तुतियों व यज्ञ हवन में निश्चित किए गए शब्द समूहों को भी मंत्र कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में मंत्र का अर्थ भिन्न है। तंत्र शास्त्रानुसार मंत्र उसे कहते हैं जो शब्द पद या पद समूह जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है वह उस देवता या शक्ति का मंत्र कहा जाता है।
विद्वानों द्वारा मंत्र की परिभाषाएँ निम्न प्रकार भी की गई हैं:-

  1. धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं।
  2. देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)
  3. दिव्य-शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को मंत्र कहते हैं।
  4. अदृश्य गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विधा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)
  5. इस प्रकार गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विधा को मंत्र कहते हैं।
    मंत्र साधना का समय:-
    मंत्र साधना के लिए समय, माह, तिथि एवं नक्षत्र:-
  6. उत्तम माह – साधना हेतु कार्तिक, अश्विन, वैशाख माघ, मार्गशीर्ष, फाल्गुन एवं श्रावण मास उत्तम होता है।
  7. उत्तम तिथि – मंत्र जाप हेतु पूर्णिमा़, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, दशमी एवं ‍त्रयोदशी तिथि उत्तम होती है।
  8. उत्तम पक्ष – शुक्ल पक्ष में शुभ चंद्र व शुभ दिन देखकर मंत्र जाप करना चाहिए।
  9. शुभ दिन – रविवार, शुक्रवार, बुधवार एवं गुरुवार मंत्र साधना के लिए उत्तम होते हैं।
  10. उत्तम नक्षत्र – पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, श्रवण रेवती, अनुराधा एवं रोहिणी ‍नक्षत्र मंत्र सिद्धि हेतु उत्तम होते हैं।

मंत्र साधना का आसन व माला:-
आसन – मंत्र जाप के समय कुश- आसन, मृग चर्म, बाघम्बर और ऊन का बना आसन उत्तम होता है।
माला – रुद्राक्ष, जयन्तीफल, तुलसी, स्फटिक, हाथीदाँत, शंख,
लाल मूँगा, चंदन, हल्दी एवं कमलगट्टा की माला से जाप सिद्ध होते हैं। रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ होती है। अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो वे मंत्र हमारे लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जैसे घर में जप करने से एक गुना, गौशाला में सौ गुना, पुण्यमय वन या बगीचे तथा तीर्थ में हजार गुना, पर्वत पर दस हजार गुना, नदी-तट पर लाख गुना, देवालय में करोड़ गुना तथा शिव के निकट अनंत गुना फल प्राप्त होता है।
जप तीन प्रकार का होता है:- वाचिक, उपांशु और मानसिक। वाचिक जप धीरे-धीरे बोलकर होता है। उपांशु-जप इस प्रकार किया जाता है, जिसे दूसरा न सुन सके। मानसिक जप में जीभ और ओष्ठ नहीं हिलते। तीनों जपों में पहले की अपेक्षा दूसरा और दूसरे की अपेक्षा तीसरा प्रकार श्रेष्ठ है।
प्रातःकाल दोनों हाथों को उत्तान कर, सायंकाल नीचे की ओर करके तथा मध्यान्ह में सीधा करके जप करना चाहिए। प्रातःकाल हाथ को नाभि के पास, मध्यान्ह में हृदय के समीप और सायंकाल मुँह के समानांतर में रखें।
जप करते समय दाहिने हाथ को जप माली में डाल लें अथवा कपड़े से ढंक लेना चाहिए। जप के लिए माला को अनामिका अंगुली पर रखकर अंगूठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा अंगुली से फेरना चाहिए। सुमेरु का उल्लंघन न करें। तर्जनी न लगाएँ। सुमेरु के पास से माला को घुमाकर दूसरी बार जपें।
जप करते समय हिलना, डोलना, बोलना, क्रोध न करें, मन में कोई गलत विचार या भावना न बनाएँ अन्यथा जप करने का कोई फल प्राप्त न होगा।

गुरु कृपा केवलम्।

जय माँ जय माँ जय जय माँ।

           हo/

(दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी)
“बाबा-भागलपुर”
भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संस्थापक
ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार।
मोबाईल नo:- 09430815864/
09835070591

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