त्याग-तपस्या, सर्वसिद्धि व वैराग्य की देवी माँ छिन्नमस्ता:- बाबा-भागलपुर 

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भागलपुर, बिहार। परिवर्तनशील जगत का अधिपति कबन्ध है और उसकी शक्ति ही छिन्नमस्ता है। विश्व की वृद्धि-ह्रास तो सदैव होती रहती है। जब ह्रास की मात्रा कम और विकास की मात्रा अधिक होती है, तब भुवनेश्वरी का प्राकटय होता है। इसके विपरीत जब निर्गम अधिक और आगम कम होता है, तब छिन्नमस्ता का प्राधान्य होता है। इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि:-

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवती भवानी अपनी सहेलियों जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान करने के बाद भूख से उनका शरीर काला पड़ गया। सहेलियों ने भी भोजन माँगा। देवी ने उनसे कुछ प्रतीक्षा करने को कहा फिर बाद में सहेलियों के विनम्र आग्रह पर उन्होंने दोनों की भूख मिटाने के लिए अपना सिर काट लिया। कटा सिर देवी के हाथों में आ गिरा व गले से तीन धाराएँ निकली। वह दो धाराओं को अपनी सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं, जिसे पीती हुई दोनों प्रसन्न होने लगी और तीसरी धारा को देवी स्वयं पान करने लगी।  तभी से ये छिन्नमस्तिके कही जाने लगीं।

भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत ही गोपनीय है। इसे कोई अधिकारी साधक ही जान सकता है। महाविद्याओं में इनका पाँचवा स्थान है। ऐसा विधान है कि आधी रात अर्थात चतुर्थ संध्याकाल में छिन्नमस्ता की उपासना से साधकों को सरस्वती सिद्ध हो जाती हैं। शत्रु विजय, समूह स्तंभन, राज्य प्राप्ति और दुर्लभ मोक्ष प्राप्ति के लिए छिन्नमस्ता की उपासना अमोघ है। छिन्नमस्ता का आध्यात्मिक स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण है। छिन्न यज्ञ शीर्ष की प्रतीक ये देवी श्वेत कमल पीठ पर खड़ी है। दिशाएँ ही इनके वस्त्र है। इनकी नाभि में  योनि चक्र है। कृष्ण (तय) और रक्त (रज) गुणों की देवियां इनकी सहचरियां हैं। ये अपना शीश काटकर भी जीवित हैं। यह अपने आप में पूर्ण अंतर्मुखी साधना का संकेत है। विद्वानों ने इस कथा में सिद्धि की चरम सीमा का निर्देश माना है। योग शास्त्र में तीन ग्रंथियां बताई गई है, जिनके भेद ना के बाद योगी को पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। इन्हें ब्रह्माग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रूद्र ग्रंथि कहा गया है। मूलाधार में ब्रह्मा ग्रंथि, मणिपुरम में विष्णु ग्रंथि तथा आज्ञा चक्र में रूद्र ग्रंथि का स्थान है। इन ग्रंथियों के भेद ना से ही अद्वैतानंद की प्राप्ति होती है। योगियों का ऐसा अनुभव है कि मणिपुर चक्र के नीचे की नाङियों में ही काम और रति का मूल है, उसी पर छिन्ना महाशक्ति आरुढ है, इनका ऊधर्व प्रभाव होने पर रुद्र ग्रंथि का भेदन होता है। छिन्नमस्ता का वज्र वैरोचनी नाम शाक्तो, बौद्ध तथा जैनों में समान रूप से प्रचलित है। देवी की दोनों सहचरिया रजोगुण तथा तमोगुण की प्रतीक है, कमल विश्वप्रपच है और काम रति चिदानंद की स्थूल वृत्ति है। बृहदारण्यक की अश्र्वशिर- विद्या, शाक्तो की हयग्रीव विद्या तथा गाणपत्यों के छिन्न शीर्ष गणपति का रहस्य भी छिन्नमस्ता से ही संबंधित है। हिरण्यकशिपु, वैरोचन आदि छिन्नमस्ता के ही उपासक थे। इसलिए इन्हें वज्र वैरोचनीया कहा गया है। वैरोचन अग्नि को कहते हैं। अग्नि के स्थान मणिपुरम में छिन्नमस्ता का ध्यान किया जाता है और वज्रनाङी में इनका प्रवाह होने से इन्हें वज्र वैरोचनीया कहते हैं। श्री भैरव तंत्र में कहा गया है कि इनकी आराधना से साधक जीव भाव से मुक्त होकर शिव भाव को प्राप्त कर लेता है।

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