इन्द्रियों पर विजय व सर्वस्य की प्राप्ति के लिए माता त्रिपुरभैरवी की उपासना :- बाबा-भागलपुर 

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क्षीयमान विश्व के अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव है। उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है। ये ललिता या महात्रिपुरसुंदरी की रथवाहिनी है। ब्रह्मांड पुराण में इन्हें गुप्त योगियों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में चित्रित किया गया है। इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि:-  दस महाविद्याओं में त्रिपुर भैरवी छठें स्थान पर परिगणित हैं। इंद्रियों पर विजय और सर्वत्र उत्कर्ष की प्राप्ति हेतु त्रिपुरभैरवी की उपासना का वर्णन शास्त्रों में मिलता है।

माँ त्रिपुरभैरवी का मुख्य उपयोग घोर कर्म में होता है। इनके ध्यान का उल्लेख दुर्गासप्तशती के तीसरे अध्याय में महिषासुर वध के प्रसंग में हुआ है। इनका रंग लाल है। यह लाल वस्त्र पहनती है, गले में मुंडमाला धारण करती है और स्तनों पर रक्त चंदन का लेप करती हैं। ये अपने हाथों में जपमाला, पुस्तक तथा वर और अभय मुद्रा धारण करती है। ये कमलासन पर विराजमान है। भगवती त्रिपुरभैरवी ने ही मधुपान करके महिषा का हृदय विदीर्ण किया था। रुद्रयामल एवं भैरवीकुलसर्वस्व में इनकी उपासना तथा कवच का उल्लेख मिलता है। संकटों से मुक्ति के लिए भी इनकी उपासना करने का विधान है।
घोर कर्म के लिए काल की विशेष अवस्थाजनित मनों को शांत कर देने वाली शक्ति को ही त्रिपुर भैरवी कहा जाता है इनका अरुण वर्ण विमर्श का प्रतीक है। इनके गले में सुशोभित मुंडमाला ही वर्णमाला है। देवी के रक्त लिप्त पयोधर रजोगुण संपन्न सृष्टि प्रक्रिया के प्रतीक है। अक्षजपमाला वर्णसमान्माय की प्रतीक है। पुस्तक ब्रह्मविद्या है, त्रिनेत्र वेदत्रयी है तथा स्मिति हास करुणा है। आगम ग्रंथों के अनुसार त्रिपुरभैरवी एकाक्षररूप (प्रणव) हैं। इनसे संपूर्ण भुवन प्रकाशित हो रहे हैं तथा अंत में इन्हीं में लय हो जाएंगे। ‘अ’ से लेकर विसर्ग तक 16 वर्ग भैरव कहलाते हैं तथा क से क्ष तक केवल योनि अथवा भैरवी कहे जाते हैं। स्वच्छन्दोघोतके प्रथम पटल में इस पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। यहाँ पर त्रिपुर भैरवी को योगीश्वरी रूप में उमा बतलाया गया है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने का दृढ़ निर्णय लिया था। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इनकी तपस्या को देख कर दंग रह गए। इससे सिद्ध होता है कि भगवान शंकर की उपासना में निरत उमा का दृढ़ निश्चय स्वरूप ही त्रिपुरभैरवी का परिचायक है। त्रिपुरभैरवी की स्तुति में कहा गया है कि भैरवी सूक्ष्म वाक तथा जगत के मूल कारण की अधिष्ठात्री है। त्रिपुरभैरवी के अनेक भेद है। यथः- सिद्धिभैरवी, चैतन्यभैरवी, भुवनेश्वरीभैरवी, कमलेश्वरीभैरवी, कामेश्वरीभैरवी, षटकूटाभैरवी, नित्याभैरवी, कोलेशीभैरवी, रूद्रभैरवी आदि। सिद्धिभैरवी उत्तरान्माय पीठ की देवी है। नित्याभैरवी पश्चिमान्माय पीठ की देवी है, इनके उपासक स्वयं भगवान शिव हैं। रूद्रभैरवी दक्षिणान्माय पीठ की देवी है। इनके उपासक भगवान विष्णु है। त्रिपुरभैरवी के भैरव वटुक है। मुंडमालातन्त्रानुसार त्रिपुरभैरवी को भगवान नृसिंह की अभिन्न शक्ति बताया गया है। सृष्टि में परिवर्तन होता रहता है। इसका मूल कारण आकर्षक-विकर्षक है। इस सृष्टि के परिवर्तन में क्षण-क्षण में होने वाली भावी क्रिया की अधिष्ठातृशक्ति ही वैदिक दृष्टि से त्रिपुरभैरवी कही जाती है। त्रिपुरभैरवी की रात्रि का नाम कालरात्रि तथा भैरव का नाम काल भैरव है।

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